The Art of the “Save the Cat” Moment: Making Viewers Care About Unlikable Protagonists
सिनेमा के पर्दे पर जब भी कोई कहानी आकार लेती है, तो उसका सबसे मजबूत स्तंभ उसका मुख्य पात्र यानी नायक (Protagonist) होता है। सिनेमा के प्रारंभिक दौर में एक अलिखित नियम हुआ करता था कि नायक को सर्वगुण संपन्न होना चाहिए। वह ईमानदार हो, बहादुर हो, नैतिक रूप से पूरी तरह शुद्ध हो और बुराई के खिलाफ खड़ा हो। लेकिन जैसे-जैसे सिनेमा का विकास हुआ और दर्शकों की समझ परिपक्व हुई, सिनेमाई कहानियों में यथार्थवाद (Realism) ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी। आज के दौर में दर्शक पूर्ण रूप से ‘सफेद’ या ‘काले’ किरदारों की बजाय ‘ग्रे’ (Grey) किरदारों को देखना अधिक पसंद करते हैं। ऐसे किरदार जो गलतियाँ करते हैं, जिनके अंदर कमियां हैं, जो स्वार्थी हो सकते हैं या यहाँ तक कि आपराधिक गतिविधियों में भी शामिल हो सकते हैं। एक पटकथा लेखक (Screenwriter) और सिनेमा के छात्र के रूप में आपके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही आती है: यदि आपका नायक नैतिक रूप से भ्रष्ट, कठोर या नापसंद किए जाने योग्य (Unlikable) है, तो दर्शक उसकी कहानी के साथ दो घंटे तक कैसे बंधे रहेंगे? दर्शक उसकी जीत की कामना क्यों करेंगे? इसी जटिल चुनौती का समाधान पटकथा लेखन की दुनिया के सबसे प्रसिद्ध सिद्धांतों में से एक में छिपा है, जिसे “सेव द कैट” (Save the Cat) कहा जाता है।
हॉलीवुड के मशहूर पटकथा लेखक और विश्लेषक ब्लेक स्नाइडर (Blake Snyder) ने वर्ष 2005 में स्क्रीनराइटिंग पर अपनी एक किताब प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था- “सेव द कैट! द लास्ट बुक ऑन स्क्रीनराइटिंग यू विल एवर नीड” (Save the Cat! The Last Book on Screenwriting You’ll Ever Need)। इस किताब ने दुनिया भर के सिनेमा छात्रों और लेखकों के लिए चरित्र चित्रण (Characterization) के व्याकरण को हमेशा के लिए बदल दिया। ब्लेक स्नाइडर ने अपनी किताब में “सेव द कैट” को एक रूपक (Metaphor) के तौर पर इस्तेमाल किया। इसे अगर शाब्दिक अर्थों में समझें तो यह फिल्म के शुरुआती हिस्से में एक ऐसा दृश्य (Scene) होता है जहाँ हम मुख्य किरदार को कुछ ऐसा करते हुए देखते हैं जो उसे दर्शकों की नजरों में एक इंसान के रूप में स्थापित कर देता है। कल्पना कीजिए कि आपका नायक एक क्रूर हत्यारा है। दर्शक उससे नफरत करने के लिए तैयार बैठे हैं। लेकिन तभी स्क्रीन पर दिखाया जाता है कि वह अपने मिशन पर जाते समय रास्ते में रुककर एक बिल्ली के बच्चे को पेड़ से सुरक्षित नीचे उतारता है। बस वह एक पल, वह एक क्षण दर्शकों के अवचेतन मन (Subconscious mind) में यह बात डाल देता है कि इस इंसान के अंदर कहीं न कहीं दया और करुणा बाकी है। इसके बाद वह भले ही पूरी फिल्म में कितने भी बुरे काम करे, दर्शक भावनात्मक रूप से उसके साथ जुड़ चुके होते हैं। यह तकनीक इतनी शक्तिशाली है कि यह दर्शकों की नैतिकता को कुछ देर के लिए दरकिनार कर देती है।
सहानुभूति (Sympathy) और समानुभूति (Empathy) का मनोविज्ञान
एक सिनेमा छात्र के रूप में आपको यह समझना बेहद आवश्यक है कि “सेव द कैट” मोमेंट का मुख्य उद्देश्य दर्शकों से सहानुभूति (Sympathy) बटोरना नहीं है, बल्कि समानुभूति (Empathy) पैदा करना है। सहानुभूति का अर्थ है किसी पर तरस खाना, जबकि समानुभूति का अर्थ है किसी की स्थिति को समझना और उसके साथ भावनात्मक रूप से खुद को खड़ा पाना। जब दर्शक किसी ‘अनलाइकेबल’ किरदार के साथ एम्पैथी महसूस करते हैं, तो वे उसके कार्यों को सही नहीं ठहरा रहे होते हैं, बल्कि वे उसके कार्यों के पीछे के कारणों को समझ रहे होते हैं।
जब हम किसी नकारात्मक नायक को स्क्रीन पर देखते हैं, तो हमारा दिमाग एक सुरक्षा तंत्र (Defense Mechanism) के तहत उससे दूरी बना लेता है। लेकिन एक चतुर फिल्म निर्माता कहानी के पहले पंद्रह मिनटों के भीतर ही एक ऐसा दृश्य बुन देता है जो नायक की भेद्यता (Vulnerability) को उजागर करता है। यह भेद्यता कई रूपों में सामने आ सकती है। हो सकता है कि नायक को किसी बहुत ही अनुचित स्थिति का सामना करना पड़ रहा हो, या वह अपने परिवार के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो, या फिर उसका कोई अपना एक ‘कोड ऑफ ऑनर’ (Code of Honor) हो। जब दर्शक इस भेद्यता को देखते हैं, तो वे उस किरदार की कमियों को माफ करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाते हैं।
उदाहरण के तौर पर डिज़्नी की क्लासिक एनिमेटेड फिल्म ‘अलादीन’ (1992) का अध्ययन करें। फिल्म का मुख्य पात्र अलादीन एक चोर है। वह बाजार से चीजें चुराता है और सिपाहियों से भागता है। सामाजिक दृष्टि से वह एक अपराधी है। लेकिन फिल्म की शुरुआत में ही एक दृश्य आता है जहाँ अलादीन बड़ी मुश्किल से चुराई गई एक ब्रेड खाने के लिए बैठता है, तभी उसकी नजर कूड़े के ढेर के पास बैठे दो भूखे बच्चों पर पड़ती है। अलादीन अपनी भूख को दरकिनार कर वह ब्रेड उन बच्चों को दे देता है। यह हॉलीवुड के इतिहास के सबसे बेहतरीन “सेव द कैट” मोमेंट्स में से एक है। इस एक दृश्य ने अलादीन को एक चोर से एक ‘दिल वाले नायक’ में बदल दिया। दर्शक अब यह नहीं देखते कि वह चोरी कर रहा है, बल्कि यह देखते हैं कि वह ऐसा व्यवस्था के सताए हुए एक गरीब के रूप में कर रहा है जिसका दिल सोने का है।
भारतीय और वैश्विक सिनेमा में “सेव द कैट” के विविध रूप
स्टडी मटेरियल के नजरिए से देखें तो यह सिद्धांत केवल हॉलीवुड तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय सिनेमा (बॉलीवुड और क्षेत्रीय सिनेमा) में भी इसका बहुत ही कुशलता से प्रयोग होता रहा है। अगर हम भारतीय सिनेमा के एक बहुत ही लोकप्रिय चरित्र ‘मुन्ना भाई’ (मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.) का विश्लेषण करें, तो मुन्ना पेशे से एक गुंडा है, लोगों को अगवा करता है, वसूली करता है और झूठ बोलता है। एक आदर्श समाज में ऐसे व्यक्ति से नफरत की जानी चाहिए। लेकिन निर्देशक राजकुमार हिरानी फिल्म के शुरुआती दृश्यों में ही स्थापित कर देते हैं कि मुन्ना अपने माता-पिता से बेइंतहा प्यार करता है और उनके सम्मान के लिए वह कुछ भी कर सकता है। इसके अलावा, अपने गैंग के सदस्यों (विशेषकर सर्किट) के प्रति उसका स्नेह और आम लोगों के प्रति उसकी एक अलग तरह की करुणा—ये सभी उसके “सेव द कैट” मोमेंट्स हैं। यही कारण है कि जब वह एक मेडिकल कॉलेज में गलत तरीके से दाखिला लेता है, तब भी दर्शक पुलिस या डीन की बजाय मुन्ना के ही जीतने की प्रार्थना करते हैं।
विश्व सिनेमा का एक और कल्ट उदाहरण हॉलीवुड फिल्म ‘एज़ गुड एज़ इट गेट्स’ (As Good As It Gets) है, जिसमें जैक निकोलसन ने मेल्विन उडाल का किरदार निभाया है। मेल्विन एक बेहद अभिमानी, नस्लभेदी, समलैंगिकता-विरोधी और ओसीडी (OCD) से पीड़ित लेखक है। फिल्म के पहले ही दृश्य में वह अपने पड़ोसी के छोटे से कुत्ते को कूड़े की नाली (Garbage chute) में फेंक देता है। यह “सेव द कैट” का बिल्कुल उल्टा यानी “किल द डॉग” मोमेंट लगता है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि मेल्विन को उसी कुत्ते की देखभाल करनी पड़ती है। जब हम देखते हैं कि वह कठोर और चिड़चिड़ा आदमी उस छोटे से कुत्ते के लिए अपने नियमों को तोड़ रहा है, उसे प्यार कर रहा है, तो दर्शकों के दिल में मेल्विन के प्रति छिपी हुई बर्फ पिघलने लगती है। कुत्ता यहाँ उस माध्यम का काम करता है जो मेल्विन के अंदर की दबी हुई इंसानियत को बाहर लाता है।
टेलीविजन के इतिहास के सबसे महान शो में से एक ‘ब्रेकिंग बैड’ (Breaking Bad) के वाल्टर वाइट का चरित्र-चित्रण इस सिद्धांत के अध्ययन के लिए एक मास्टरक्लास है। वाल्टर वाइट कहानी में आगे चलकर हत्यारा, ड्रग माफिया और एक बेहद खतरनाक इंसान बन जाता है। लेकिन दर्शक फिर भी अंत तक उसका साथ नहीं छोड़ते। ऐसा क्यों? क्योंकि शो के निर्माता विंस गिलिगन ने पहले एपिसोड में ही वाल्टर को एक ‘पीड़ित’ (Victim) के रूप में स्थापित कर दिया था। वह एक ओवर-क्वालिफाइड लेकिन कम वेतन पाने वाला रसायन विज्ञान का शिक्षक है, जिसे उसके छात्र सम्मान नहीं देते। उसका बेटा सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) से पीड़ित है, उसकी पत्नी गर्भवती है और सबसे बड़ा झटका तब लगता है जब उसे पता चलता है कि उसे फेफड़ों का कैंसर है। यह “अनफेयर विक्टिमाइजेशन” (Unfair Victimization) दर्शकों के भीतर इतनी गहरी एम्पैथी पैदा कर देता है कि जब वाल्टर अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करने के लिए ड्रग्स बनाने का फैसला करता है, तो हम न सिर्फ उसे माफ कर देते हैं, बल्कि चाहते हैं कि वह पकड़ा न जाए।
पटकथा में “सेव द कैट” मोमेंट गढ़ने की तकनीक और सावधानियां
सिनेमा के छात्रों को अपनी पटकथा में इस मोमेंट को शामिल करते समय कुछ बहुत ही बारीक तकनीकी पहलुओं का ध्यान रखना चाहिए। ब्लेक स्नाइडर का यह सिद्धांत कोई गणित का फॉर्मूला नहीं है जिसे जस का तस लागू कर दिया जाए। यदि दर्शक यह भांप गए कि आप उन्हें जबरन नायक से प्यार करवाने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है। इसे ‘मैनिपुलेशन’ या दर्शकों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ माना जाता है। इसलिए, यह दृश्य कहानी और किरदार की प्रकृति के भीतर से ही स्वाभाविक (Organic) रूप से निकलना चाहिए।
यहाँ कुछ प्रमुख रणनीतियां दी गई हैं जिनका उपयोग आप एक नापसंद किए जाने वाले किरदार को दर्शकों से जोड़ने के लिए कर सकते हैं:
पहला है ‘विशिष्ट कौशल या क्षमता’ (Competence)। कभी-कभी कोई किरदार अपने स्वभाव से बहुत रूखा या बुरा हो सकता है, लेकिन अगर वह अपने काम में अविश्वसनीय रूप से माहिर है, तो दर्शक स्वतः ही उसकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। शर्लक होम्स (Sherlock Holmes) जैसे किरदार अक्सर घमंडी और असामाजिक (Antisocial) होते हैं, लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता दर्शकों को बाँध कर रखती है। दर्शक उनके व्यवहार को नजरअंदाज कर उनकी प्रतिभा का सम्मान करने लगते हैं।
दूसरा तरीका है ‘खुद से ज्यादा किसी और की परवाह करना’ (Loving someone else more than oneself)। एक क्रूर हत्यारा जो अपनी छोटी बेटी के लिए दुनिया से लड़ सकता है, या एक भ्रष्ट नेता जो अपने वफादार दोस्त के लिए अपनी जान दांव पर लगा देता है। यह वफादारी और निस्वार्थ प्रेम किरदार में गहराई (Depth) पैदा करता है। हॉलीवुड फिल्म ‘लियोन: द प्रोफेशनल’ (Léon: The Professional) इसका सटीक उदाहरण है, जहाँ एक खूंखार हिटमैन एक 12 साल की अनाथ बच्ची (मटिल्डा) की रक्षा करता है।
तीसरा और बहुत महत्वपूर्ण तरीका है ‘कठोर दुनिया का नियम’ (The Rule of a Harsh World)। यदि आपका नायक बुरा है, तो आप प्रतिपक्षी (Antagonist) और फिल्म की दुनिया को नायक से भी अधिक बुरा और ظالم (Cruel) बना दें। ‘जोकर’ (Joker) फिल्म के आर्थर फ्लेक के मामले में यही होता है। आर्थर मानसिक रूप से बीमार है और अंततः वह हत्यारा बन जाता है, लेकिन फिल्म के शुरुआती आधे हिस्से में समाज, व्यवस्था और यहाँ तक कि सड़क के गुंडे भी उसके साथ इतना क्रूर व्यवहार करते हैं कि दर्शक पूरी तरह से आर्थर के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। जब आर्थर पलटवार करता है, तो दर्शक उसे अपराध नहीं, बल्कि न्याय के रूप में देखते हैं।
निष्कर्ष
अंत में, सिनेमा के विद्यार्थियों को यह याद रखना चाहिए कि एक मजबूत पटकथा वह नहीं है जो दर्शकों को यह बताए कि उन्हें क्या महसूस करना है, बल्कि वह है जो उन्हें स्वतः ही महसूस करने पर मजबूर कर दे। “सेव द कैट” मोमेंट सिनेमाई मनोविज्ञान का वह ब्रह्मास्त्र है जो चरित्र के बाहरी आवरण को भेदकर उसकी मानवीय आत्मा (Human soul) को दर्शकों के सामने नग्न कर देता है।
एक लेखक के तौर पर आपको अपने नायक को परफेक्ट या पूरी तरह से अच्छा बनाने की जरूरत नहीं है। दर्शकों को राम की तरह आदर्श नायक हमेशा नहीं चाहिए, उन्हें ऐसे किरदार चाहिए जो उनकी अपनी तरह टूटते हों, बिखरते हों, गलतियां करते हों, लेकिन फिर भी किसी अंधेरे कोने में उनके भीतर थोड़ी सी रोशनी, थोड़ी सी इंसानियत बाकी हो। वही छोटी सी रोशनी “सेव द कैट” मोमेंट है। जब भी आप किसी डार्क या एंटी-हीरो (Anti-hero) की कहानी लिखें, तो खुद से यह सवाल जरूर पूछें कि “मेरे इस जटिल, स्वार्थी और कठोर किरदार के अंदर वह कौन सा कोना है जहाँ अभी भी एक मासूम बच्चा या एक दयालु इंसान छिपा है?” उस कोने को खोजें, उसे स्क्रीन पर एक छोटे लेकिन प्रभावशाली दृश्य के माध्यम से दिखाएं, और आप देखेंगे कि दर्शक आपके उस नकारात्मक किरदार की यात्रा में भी अपनी खुद की परछाई ढूंढने लगेंगे। सिनेमा की असली ताकत इसी भावनात्मक हेरफेर और चरित्र की गहराई में ही छिपी है।