‘प्रैक्टिकल एक्सप्लोज़न’ (Practical Explosion) की कला—फिल्मों में ‘असली’ और सुरक्षित धमाके कैसे किए जाते हैं?

The Art of the Practical Explosion: How Pyrotechnics Are Safely Rigged for the Perfect Shot

कल्पना कीजिए कि आप सिनेमाघर में अपनी पसंदीदा एक्शन या सुपरहीरो फिल्म देख रहे हैं। स्क्रीन पर हीरो विलेन के अड्डे से बाहर निकल रहा है, और ठीक उसी समय उसके पीछे एक बहुत बड़ा, आग के गोलों वाला धमाका होता है। कारें हवा में उड़ जाती हैं, कांच के टुकड़े चारों तरफ बिखर जाते हैं, और सिनेमाघर की कुर्सियां उस धमाके की आवाज़ से कांप उठती हैं। लेकिन हमारा हीरो बिना पीछे मुड़े, बड़े ही ‘कूल’ (Cool) अंदाज़ में आगे बढ़ता रहता है।

इस रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्य को देखकर हमारे दिमाग में अक्सर दो सवाल आते हैं: “क्या यह धमाका असली था?” और “अगर यह असली था, तो हीरो को चोट क्यों नहीं लगी?”

आज के कंप्यूटर ग्राफिक्स (CGI) के युग में, कई धमाके कंप्यूटर पर बनाए जाते हैं। लेकिन दुनिया के सबसे बेहतरीन निर्देशक (जैसे क्रिस्टोफर नोलन या रोहित शेट्टी) आज भी ‘असली’ धमाकों पर भरोसा करते हैं। सिनेमा की दुनिया में इन असली धमाकों को ‘प्रैक्टिकल इफेक्ट्स’ (Practical Effects) और इन्हें करने वाले विज्ञान को ‘पायरोटेक्निक्स’ (Pyrotechnics) कहा जाता है।

12 से 17 साल की उम्र में, जब आप विज्ञान (Science) और रसायन विज्ञान (Chemistry) के बुनियादी नियम सीख रहे हैं, तो यह जानना बेहद रोमांचक है कि हॉलीवुड और बॉलीवुड के वैज्ञानिक (पायरोटेक्निशियन) कैमरे के सामने एक खतरनाक ‘बम’ को एक खूबसूरत और 100% सुरक्षित ‘कला’ में कैसे बदल देते हैं। आइए, इस एक्सप्लेनर में आग और बारूद के इस नियंत्रित मायाजाल को गहराई से समझते हैं।

1. ‘पायरोटेक्निक्स’ (Pyrotechnics) आखिर क्या है?

‘पायरोटेक्निक्स’ ग्रीक भाषा के दो शब्दों से बना है: ‘पायरो’ (Pyro) यानी आग, और ‘टेक्निक’ यानी कला। यह आग, बारूद और विस्फोटकों (Explosives) को सुरक्षित तरीके से नियंत्रित करने का विज्ञान है।

जो लोग फिल्मों में धमाके करते हैं, वे कोई आम स्टंटमैन नहीं होते; वे लाइसेंस प्राप्त केमिकल इंजीनियर और विस्फोटक विशेषज्ञ होते हैं। उनका काम स्क्रीन पर तबाही मचाना ज़रूर है, लेकिन उनकी सबसे पहली और आखिरी प्राथमिकता ‘सुरक्षा’ (Safety) होती है। वे एक ऐसे धमाके की रचना करते हैं जो देखने में दुनिया का अंत लगे, लेकिन असल में वह इतना सुरक्षित हो कि उससे सेट पर मौजूद किसी इंसान के बाल भी न जलें।

2. सुरक्षित धमाके का विज्ञान: यह जादू काम कैसे करता है?

एक सुरक्षित धमाका करने के लिए विज्ञान, गणित और भौतिकी (Physics) के कुछ बहुत ही चतुर उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है:

क. स्टील मोर्टार और ‘डायरेक्शनल ब्लास्ट’ (The Steel Mortar): जब असल ज़िंदगी में कोई बम फटता है, तो उसकी ऊर्जा (Energy) और आग चारों दिशाओं (360 डिग्री) में फैलती है, जो बहुत खतरनाक है। फिल्मों में ऐसा कभी नहीं होता। पायरोटेक्निशियन भारी स्टील से बने बेलनाकार बर्तनों (जिन्हें मोर्टार कहते हैं) का इस्तेमाल करते हैं। विस्फोटक को इस स्टील के बर्तन के अंदर रखा जाता है। जब धमाका होता है, तो स्टील की मज़बूत दीवारें आग को अगल-बगल नहीं फैलने देतीं; वे आग को सीधे ‘ऊपर की तरफ’ (Upwards) धकेल देती हैं। इसी कारण से फिल्मों के धमाके हमेशा मशरूम या खंभे की तरह सीधे ऊपर उठते हैं, और पास खड़ा हीरो बिल्कुल सुरक्षित रहता है।

ख. लिक्विड फ्यूल का मायाजाल (The Liquid Fireball): क्या आपने ध्यान दिया है कि फिल्मों के धमाकों में बहुत सारी पीली और नारंगी आग होती है? असली सैन्य विस्फोटों (Military explosions) में इतनी आग नहीं होती, उनमें सिर्फ धूल और धुआं होता है। लेकिन दर्शकों को ‘आग’ देखना पसंद है! इसलिए पायरोटेक्निशियन ‘ब्लैक पाउडर’ (बारूद) के साथ गैसोलीन (Gasoline) या प्रोपेन गैस का इस्तेमाल करते हैं। जब बारूद फटता है, तो वह गैसोलीन को हवा में उछाल कर उसमें आग लगा देता है। यह एक धीमी गति से जलने वाला, बहुत ही सुंदर और बड़ा ‘फायरबॉल’ (Fireball) बनाता है, जो स्क्रीन पर गज़ब का दिखता है।

ग. उड़ता हुआ नकली मलबा (The Soft Debris Trick): धमाके के बाद स्क्रीन पर जो भारी पत्थर, कंक्रीट के टुकड़े और लोहे के दरवाज़े हवा में उड़ते हुए हीरो के पास गिरते हैं, वे असली नहीं होते! अगर वे असली होंगे, तो एक्टर्स की जान जा सकती है। यह ‘मलबा’ दरअसल कॉर्क (Cork), बाल्सा की लकड़ी (बहुत हल्की लकड़ी), फोम (Foam), या रबर से बना होता है, जिसे पेंट करके लोहे या पत्थर जैसा दिखाया जाता है। अगर यह मलबा हीरो के सिर पर गिर भी जाए, तो उसे स्पंज से ज़्यादा कुछ महसूस नहीं होगा।

घ. ‘स्क्विब’ और शरीर पर गोलियों के निशान (The Squib): जब फिल्म में किसी एक्टर को गोली लगती है और उसके कपड़ों से खून का फव्वारा निकलता है, तो वहां भी पायरोटेक्निक्स का इस्तेमाल होता है। एक्टर के कपड़ों के नीचे एक ‘स्क्विब’ (Squib) छिपा होता है। यह एक बहुत ही छोटा और सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक पटाखा होता है, जिसके ऊपर नकली खून से भरी एक थैली (Blood pack) रखी होती है। जब कैमरे के पीछे खड़ा तकनीशियन रिमोट का बटन दबाता है, तो वह छोटा सा पटाखा फटता है, थैली फटती है, और स्क्रीन पर ऐसा लगता है जैसे एक्टर को गोली लगी हो। कपड़े के नीचे एक लोहे या प्लास्टिक की प्लेट होती है, जिससे एक्टर की त्वचा को कोई नुकसान नहीं पहुँचता।

छात्रों के लिए विशेष ‘स्टडी फैक्ट’ (Study Fact): द ऑप्नहाइमर चैलेंज (The Oppenheimer Challenge): हॉलीवुड के महान निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन अपनी फिल्मों में कंप्यूटर ग्राफिक्स (CGI) से नफरत करने के लिए जाने जाते हैं। अपनी 2023 की ऑस्कर विजेता फिल्म ‘ओपेनहाइमर’ (Oppenheimer) में, उन्होंने दुनिया के पहले ‘परमाणु बम’ के धमाके (Trinity Test) को दिखाने के लिए किसी भी CGI का इस्तेमाल नहीं किया! नोलन और उनके विज्ञानियों की टीम ने मैग्नीशियम, एल्युमिनियम पाउडर और प्रोपेन का एक खास मिश्रण तैयार किया, जिसने कैमरे के सामने बिल्कुल असली परमाणु बम जैसा दिखने वाला, लेकिन पूरी तरह से सुरक्षित ‘माइक्रो-धमाका’ किया।

3. मनोविज्ञान: निर्देशक ‘असली’ धमाके क्यों चाहते हैं?

आज जब कंप्यूटर (CGI) पर सब कुछ बनाना इतना आसान है, तो करोड़ों रुपये और इतना जोखिम उठाकर असली धमाके क्यों किए जाते हैं? इसके दो बड़े कारण हैं:

  1. रोशनी का असली बर्ताव (Interactive Lighting): आग सिर्फ एक दृश्य नहीं है; यह रोशनी (Light) का एक बहुत बड़ा स्रोत है। जब कोई असली धमाका होता है, तो आग की वह तेज़ नारंगी रोशनी एक्टर के पसीने से भीगे चेहरे पर, आस-पास की कारों के शीशे पर और ज़मीन पर जिस तरह से चमकती है, उसे कंप्यूटर पर 100% असली तरीके से बनाना लगभग नामुमकिन है। हमारी आँखें तुरंत ‘नकली रोशनी’ को पकड़ लेती हैं।

  2. शारीरिक प्रतिक्रिया (Physical Reaction): जब एक्टर के पीछे कोई असली (लेकिन सुरक्षित) धमाका होता है, तो हवा का एक ज़ोरदार दबाव (Shockwave) पैदा होता है। उस शॉकवेव से एक्टर के कपड़े फड़फड़ाते हैं, उसके बाल उड़ते हैं और उसकी आँखों में जो एक स्वाभाविक डर या एड्रेनालाईन (Adrenaline) आता है, वह एक्टिंग से नहीं लाया जा सकता। वह ‘असली’ होता है!

4. कैमरे का ‘धोखा’ और फोर्सड पर्सपेक्टिव (Forced Perspective)

कई बार धमाका एक्टर से बहुत दूर होता है, लेकिन कैमरे के लेंस का इस्तेमाल इस तरह किया जाता है कि वह बिल्कुल एक्टर के पीछे लगता है (इसे हमने अपने ‘डॉली ज़ूम’ वाले लेख में ‘कम्प्रेशन’ के रूप में समझा था)। ‘लॉन्ग लेंस’ (Long Lens) का इस्तेमाल करके दूर के धमाके को पास खींच लिया जाता है, जिससे हीरो 100% सुरक्षित रहता है, लेकिन स्क्रीन पर लगता है कि वह आग की लपटों से बस इंच भर दूर है!

विज्ञान और कला का सबसे धमाकेदार संगम

एक फिल्म के सेट पर धमाका कोई दुर्घटना नहीं है; यह एक बहुत ही खूबसूरती से ‘कोरियोग्राफ’ (Choreograph) किया गया डांस है। पायरोटेक्निक्स हमें सिखाता है कि विज्ञान का इस्तेमाल सिर्फ लैब में बैठकर टेस्ट-ट्यूब हिलाने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि रसायन विज्ञान (Chemistry) और भौतिकी (Physics) के नियमों का इस्तेमाल करके दुनिया की सबसे बेहतरीन कला (Art) और मनोरंजन का निर्माण भी किया जा सकता है।

एक जागरूक छात्र के रूप में, जब आप इस विज्ञान को समझ लेते हैं, तो आप पर्दे पर होने वाले विनाश से डरते नहीं हैं, बल्कि आप उस इंजीनियर की बुद्धिमानी की दाद देते हैं जिसने तबाही को भी एक सुरक्षित मास्टरपीस में बदल दिया।


💥 DIY साइंस एंड सिनेमा: द ‘फ्रेमिंग’ चैलेंज (The Framing Challenge)

असली बारूद से खेलना तो खतरनाक है, लेकिन हम कैमरे के ‘धोखे’ का विज्ञान अपने स्मार्टफोन से ज़रूर सीख सकते हैं! इस वीकेंड अपने दोस्तों के साथ “फोर्सड पर्सपेक्टिव” (Forced Perspective) का यह मज़ेदार चैलेंज करें:

आपका टास्क:

  1. अपने किसी खिलौने (जैसे कोई छोटी सी कार या एक्शन फिगर) को कैमरे के बिल्कुल पास (लगभग 5 इंच दूर) रखें।

  2. अपने दोस्त को उस खिलौने से बहुत दूर (लगभग 15-20 फीट पीछे) खड़ा करें।

  3. अब अपने फोन के कैमरे को इस एंगल पर सेट करें कि स्क्रीन पर वह छोटा सा खिलौना आपके दोस्त से बहुत बड़ा दिखाई दे!

  4. एक मज़ेदार फोटो क्लिक करें जिसमें ऐसा लगे कि आपका दोस्त उस विशाल खिलौने से डरकर भाग रहा है।

यह वही ‘लेंस ट्रिक’ है जिसे फिल्म निर्माता दूर के धमाके को हीरो के बिल्कुल पास दिखाने के लिए इस्तेमाल करते हैं!

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