The Passport Forgery: Could a High-End Fake Actually Get You Through an Airport?
कल्पना कीजिए उस जबरदस्त जासूसी फिल्म के सीन की। हमारा हीरो, जिसे पुलिस और दुश्मन दोनों ढूंढ रहे हैं, एक अनजान शहर के रेलवे स्टेशन पर पहुंचता है। वह वहां के एक सीक्रेट लॉकर को खोलता है। उसके अंदर एक बैग है जिसमें नोटों की गड्डियां हैं और साथ ही रखे हैं 5-6 अलग-अलग देशों के पासपोर्ट। किसी पर उसका नाम ‘जॉन’ है, तो किसी पर ‘डेविड’। वह एक अमेरिकन पासपोर्ट उठाता है, अपनी जैकेट ठीक करता है और सीधे इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंच जाता है।
वह इमिग्रेशन काउंटर पर जाता है। अधिकारी उसका पासपोर्ट लेता है, उसकी शक्ल देखता है, पासपोर्ट पर ठप्पा मारता है और कहता है, “हैव अ सेफ फ्लाइट, सर।” और हमारा हीरो मुस्कुराते हुए सुरक्षा घेरा पार कर जाता है। ‘जेसन बॉर्न’ (Jason Bourne) से लेकर ‘मिशन इम्पॉसिबल’ (Mission Impossible) तक, हर जासूसी फिल्म ने हमें यही सिखाया है कि अगर आपके पास पैसे हैं, तो अंडरवर्ल्ड का कोई भी ‘मास्टर फॉरजर’ (जाली कागज बनाने वाला उस्ताद) आपको एक ऐसा शानदार नकली पासपोर्ट बनाकर दे सकता है, जिसे कोई मशीन नहीं पकड़ सकती।
लेकिन मेरे दोस्त, अपनी कुर्सी की पेटी कस लीजिए। आज की इस विशेष और लंबी पड़ताल में हम हॉलीवुड के इस सबसे क्लासिक झूठ के परखच्चे उड़ाने वाले हैं। हम जानेंगे कि आज के डिजिटल दौर में, एक नकली पासपोर्ट लेकर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर जाना अपनी मौत और जेल को खुद बुलावा देने जैसा क्यों है।
फिल्मी भ्रम: डार्क रूम, गोंद और नकली मोहरें
फिल्मों में हमें दिखाया जाता है कि एक जासूस किसी तहखाने में जाता है। वहां एक बूढ़ा आदमी मैग्निफाइंग ग्लास (लेंस) लगाकर बैठा है। वह पुराने पासपोर्ट से किसी की फोटो उखाड़ता है, वहां हीरो की फोटो चिपकाता है, एक नकली मोहर मारता है और 10 हजार डॉलर लेकर एक नया पहचान पत्र तैयार कर देता है।
अस्सी और नब्बे के दशक में शायद यह थोड़ी बहुत सच्चाई रही हो, जब पासपोर्ट सिर्फ कागज की एक छोटी सी किताब हुआ करते थे। लेकिन 9/11 के हमलों के बाद पूरी दुनिया की सुरक्षा एजेंसियां जाग गईं। आज का पासपोर्ट कोई ‘किताब’ नहीं है, बल्कि वह सुरक्षा की कई परतों से लिपटा हुआ एक चलता-फिरता ‘सुपर कंप्यूटर’ है।
अगर कोई इंसान आज एक बहुत ही शानदार दिखने वाला नकली पासपोर्ट लेकर इमिग्रेशन काउंटर पर जाता है, तो वह अधिकारी को शायद धोखा दे दे, लेकिन उन मशीनों को धोखा देना लगभग नामुमकिन है जो उस पासपोर्ट को पढ़ती हैं। आइए एक-एक करके सुरक्षा की उन परतों को खोलते हैं जिन्हें तोड़ना फिल्मों में बहुत आसान, लेकिन असल जिंदगी में असंभव है।
पहली दीवार: भौतिक सुरक्षा (कागज और स्याही का चक्रव्यूह)
अगर कोई जालीसाज़ सोचता है कि वह प्रिंटर से एक नया पासपोर्ट छाप लेगा या किसी पुराने पासपोर्ट की फोटो बदल लेगा, तो उसे सबसे पहले उस पासपोर्ट के पन्नों से लड़ना होगा।
आजकल के आधुनिक पासपोर्ट (जैसे ई-पासपोर्ट) का वह पन्ना, जिस पर आपकी फोटो और जानकारी होती है, वह कोई आम कागज नहीं होता। उसे ‘पॉलीकार्बोनेट’ (Polycarbonate) कहते हैं। यह वही प्लास्टिक है जिससे बुलेटप्रूफ कांच बनते हैं। आपकी फोटो उस प्लास्टिक के ऊपर छापी या चिपकाई नहीं जाती, बल्कि लेजर (Laser) की मदद से उस प्लास्टिक की कई परतों के एकदम अंदर उकेरी जाती है।
अगर कोई जालीसाज़ उस फोटो को खुरचने या बदलने की कोशिश करेगा, तो वह पूरा पन्ना टूट जाएगा या जल जाएगा, लेकिन फोटो बाहर नहीं आएगी। इसके अलावा, पासपोर्ट के पन्नों में ऐसी ‘अदृश्य स्याही’ (UV Ink) का इस्तेमाल होता है जो सामान्य रोशनी में दिखती ही नहीं है। लेकिन जैसे ही इमिग्रेशन अधिकारी उसे अल्ट्रा-वॉयलेट (UV) स्कैनर के नीचे रखता है, वह पूरा पन्ना दीवाली की रात की तरह जगमगाने लगता है, जिसमें देश का नक्शा और कई गुप्त डिजाइन उभर आते हैं। और तो और, पन्नों पर बनी जो बारीक लाइनें हमें सिर्फ एक डिजाइन लगती हैं, वो असल में माइक्रो-प्रिंटिंग (Micro-printing) होती है—यानी अगर आप उसे माइक्रोस्कोप से देखेंगे, तो उन लाइनों में छोटे-छोटे अक्षरों में देश का नाम लिखा होता है। एक आम प्रिंटर इन सब चीजों की नकल कर ही नहीं सकता।
दूसरी और सबसे बड़ी दीवार: डिजिटल सुरक्षा (असली बॉस, माइक्रोचिप)
चलिए एक पल के लिए मान लेते हैं कि हॉलीवुड के उस जासूस ने किसी तरह करोड़ों की मशीनें लगाकर बिल्कुल असली दिखने वाला पॉलीकार्बोनेट का पन्ना छाप लिया। क्या अब वह एयरपोर्ट पार कर लेगा? बिल्कुल नहीं। क्योंकि अब उसका सामना होगा पासपोर्ट के असली बॉस से— ‘आरएफआईडी चिप’ (RFID Chip)।
आपने ध्यान दिया होगा कि आजकल हर पासपोर्ट के कवर पर नीचे की तरफ एक छोटा सा कैमरे जैसा सोने के रंग का लोगो (Logo) बना होता है। इसका मतलब है कि वह एक ई-पासपोर्ट (e-Passport) है। उस कवर के अंदर एक बहुत ही छोटी सी डिजिटल चिप और एंटीना छुपा होता है।
जब आप अपना पासपोर्ट इमिग्रेशन स्कैनर पर रखते हैं, तो वह स्कैनर सिर्फ फोटो नहीं देखता, वह उस चिप के अंदर की जानकारी को पढ़ता है। उस चिप में आपका नाम, जन्मतिथि और आपकी एक हाई-रेजोल्यूशन डिजिटल फोटो सेव होती है।
अब आप कहेंगे, “अरे, तो हैकर उस चिप का डेटा भी तो बदल सकता है!” यहीं पर आता है विज्ञान का सबसे शानदार ताला— जिसे ‘क्रिप्टोग्राफी’ (Cryptography) कहते हैं।
उस चिप के अंदर जो भी डेटा डाला जाता है, उसे छापने वाला देश (जैसे भारत सरकार या अमेरिकी सरकार) अपनी एक ‘डिजिटल मुहर’ (Digital Signature) लगाता है। यह मुहर गणित के एक ऐसे बेहद जटिल फॉर्मूले से बनी होती है जिसे दुनिया का कोई भी हैकर या सुपर कंप्यूटर नहीं तोड़ सकता।
जब स्कैनर चिप को पढ़ता है, तो वह कंप्यूटर तुरंत जांचता है कि क्या इस चिप पर लगी डिजिटल मुहर असली सरकार की है? इसके लिए वह दुनिया भर के देशों की एक मास्टर डिक्शनरी (जिसे ICAO PKD कहते हैं) से संपर्क करता है। अगर जालीसाज़ ने चिप के अंदर की आपकी फोटो या नाम में एक ‘डॉट’ (बिंदु) का भी बदलाव किया है, तो वह सरकारी डिजिटल मुहर तुरंत टूट जाएगी। मशीन की स्क्रीन लाल हो जाएगी और बीप बजने लगेगी। हैकर डेटा बदल सकता है, लेकिन वह उस देश की ‘गुप्त डिजिटल मुहर’ कभी नहीं बना सकता। यहाँ आकर हॉलीवुड के सारे जासूस फेल हो जाते हैं।
तीसरी दीवार: चेहरे का गणित (बायोमेट्रिक्स और ई-गेट्स)
मान लीजिए कोई इतना किस्मत वाला है कि उसने किसी हमशक्ल का असली पासपोर्ट चुरा लिया। चिप भी असली है और मुहर भी असली है। अब वह एयरपोर्ट के आधुनिक ‘ई-गेट’ (e-Gate) पर पहुंचता है, जहां कोई इंसान नहीं, सिर्फ मशीनें होती हैं।
वह पासपोर्ट स्कैनर पर रखता है, शीशे का दरवाजा खुलता है और वह अंदर जाता है। अब उसके सामने एक कैमरा है। फिल्मों में जासूस थोड़ा सा चश्मा नीचे करते हैं, बाल बनाते हैं और कैमरा उन्हें पास कर देता है।
असल जिंदगी में यह फेशियल रिकग्निशन (Facial Recognition) तकनीक है। यह कैमरा आपकी शक्ल नहीं देखता, यह आपके चेहरे का ‘गणित’ मापता है। आपकी दोनों आंखों के बीच की दूरी कितनी है? आपकी नाक की हड्डी का कोण (Angle) क्या है? आपके जबड़े की गहराई कितनी है? यह कैमरा कुछ ही सेकंड में आपके चेहरे का एक 3D नक्शा तैयार कर लेता है।
इसके बाद, मशीन इस 3D नक्शे का मिलान उस डिजिटल फोटो से करती है जो आपके पासपोर्ट की उस ‘चिप’ के अंदर सुरक्षित रखी हुई है (कागज वाली फोटो से नहीं)। चूंकि हमशक्ल दिखने में एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन उनकी हड्डियों का ढांचा और चेहरे का गणित कभी एक जैसा नहीं हो सकता। जैसे ही गणित फेल होगा, ई-गेट के दरवाजे बंद हो जाएंगे और अलार्म बज जाएगा।
चौथी दीवार: इंटरपोल का जाल (The Database of Doom)
एक आखिरी फिल्मी पैंतरा बचता है। क्या हो अगर किसी ने कोई ब्लैंक (खाली) और बिल्कुल असली पासपोर्ट सीधे सरकारी दफ्तर से ही चुरा लिया हो और उसमें अपनी जानकारी भर ली हो?
यहाँ इंटरपोल (Interpol) का ‘SLTD’ (Stolen and Lost Travel Documents) नाम का डेटाबेस काम आता है। जैसे ही किसी सरकारी दफ्तर से कोई खाली पासपोर्ट चोरी होता है, उसके सीरियल नंबर इस ग्लोबल डेटाबेस में डाल दिए जाते हैं। दुनिया भर के एयरपोर्ट इस डेटाबेस से जुड़े हैं। जैसे ही वह चुराया हुआ ‘असली’ पासपोर्ट स्कैनर पर रखा जाएगा, मशीन उसे स्कैन करने में सिर्फ एक सेकंड का दसवां हिस्सा लेगी और बता देगी कि यह पासपोर्ट चोरी का है। आपके मुस्कुराने से पहले ही एयरपोर्ट की पुलिस आपके कंधे पर हाथ रख चुकी होगी।
कहानी का असली सार
आज के दौर में जो लोग बॉर्डर पार करने के लिए जाली पहचान का इस्तेमाल करते हैं, वे जेसन बॉर्न की तरह कोई शानदार नकली पासपोर्ट लेकर मेन एयरपोर्ट से शान से नहीं गुजरते। वे अक्सर घूसखोरी (Corruption) का सहारा लेते हैं, या कंटीले तारों के नीचे से छुपकर सीमा पार करते हैं, या फिर फर्जी जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर असली सरकारी पासपोर्ट बनवाते हैं (जो कि जालसाजी नहीं, बल्कि पहचान की चोरी या Identity Theft है)।
लेकिन अगर हम विशुद्ध रूप से एक ‘नकली पासपोर्ट’ बनाने की बात करें—यानी किसी डार्क रूम में बैठकर फर्जी चिप, फर्जी पॉलीकार्बोनेट और फर्जी मुहरें बनाने की—तो यह आज के भौतिक विज्ञान, कंप्यूटर साइंस और क्रिप्टोग्राफी के सामने पूरी तरह से नामुमकिन है।
तो अगली बार जब आप किसी फिल्म में किसी शातिर जासूस को 10 हजार डॉलर देकर एक घंटे में नकली पासपोर्ट बनवाते और एयरपोर्ट के इलेक्ट्रॉनिक गेट से मजे से गुजरते हुए देखें, तो अपने पॉपकॉर्न खाइएगा और जोर से हंसिएगा। क्योंकि अब आप जानते हैं कि वह जासूस हकीकत में उस इलेक्ट्रॉनिक गेट से आगे नहीं, बल्कि सीधे पूछताछ वाले उस अंधेरे कमरे में जाएगा जहाँ उसे असली पुलिस का सामना करना पड़ेगा!